भारत की अदृश्य रीढ़: कैसे ‘संदीप भैया’ एक ऐसे देश को आईना दिखाता है जो अपने सबसे वफ़ादार बेटों को भूल जाता है

आप संदीप भैया को पहले से जानते हैं। शायद वो कोचिंग क्लास में आपके बगल में बैठा था, या किसी पारिवारिक खाने की मेज़ पर सामने। उसने सबसे ज़्यादा पढ़ा, सबसे बड़े सपने देखे और फिर भी किसी तरह सीढ़ी थामे खड़ा रहा जबकि बाकी सब ऊपर चढ़ते गए। उसने कभी शिकायत नहीं की। किसी ने पूछा भी नहीं कि वो ठीक है या नहीं। और सच यह है , लाखों भारतीय आज भी यही ज़ख्म चुपचाप अपने भीतर लिए जी रहे हैं, बिना किसी से कहे, बिना कहीं रख पाए। टीवीएफ़ का ‘संदीप भैया’ सिर्फ उनकी कहानी नहीं सुनाता वो पहली बार, बेधड़क होकर, उस ज़ख्म का नाम लेता है।
‘एस्पिरेंट्स’ की दुनिया से निकला यह शो पूरी तरह उसी इंसान के इर्द-गिर्द बना है। और सनी हिंदुजा ने उसे इतनी शांत, बिना किसी दिखावे वाली सच्चाई के साथ जिया है कि आप भूल जाते हैं कि कोई अभिनय हो रहा है।
यह कहानी है संदीप सिंह ओहलान की , एक ऐसे युवक की जो यूपीएससी की परीक्षा एक से ज़्यादा बार हार चुका है और अब आरुषि को पढ़ा रहा है ,एक ऐसी लड़की जो खुद पर भरोसा नहीं कर पाती, घर की तंगी से जूझती है, और परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाए चलती है। उसकी तैयारी के रास्ते से यह शो धीरे-धीरे उघाड़ता है कि भारत में सरकारी नौकरी का सपना असल में क्या माँगता है। फ़ीस नहीं। वो कुछ और , जो किसी रसीद पर नहीं लिखा होता।
इस शो की ख़ासियत यही है कि यह क्या नहीं करता। यह दर्द को नाटकीय नहीं बनाता। जब संदीप कोई गहरी बात कहता है, तो पीछे से कोई भारी धुन नहीं बजती। समझदारी की बातें बस यूँ ही आती हैं चाय के साथ, आधे जुमलों में। सनी हिंदुजा का संयम असाधारण है और एक ऐसी कहानी में जो अनदेखे लोगों के बारे में है, यह संयम किसी गहरी सोच का नतीजा लगता है।
क्योंकि संदीप की कहानी दरअसल उसकी अपनी नाकामी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसे कुछ लोगों की हार की ज़रूरत है ,जो काबिलियत से ज़्यादा जान-पहचान को, और मेहनत से ज़्यादा पहुँच को इनाम देती है। इस शो का दबा हुआ गुस्सा यहीं बसता है , इस असहज सच्चाई में, जो बिना आवाज़ उठाए कह दी जाती है।
जहाँ हाल की दूसरी फ़िल्में आग या ज़िद लेकर आईं, वहाँ ‘संदीप भैया’ कुछ और दिखाता है , कुछ ज़्यादा मुश्किल। एक ऐसा इंसान जो बस चलता रहता है। न कोई विस्फोट, न कोई नाटकीय मोड़ ,बस जारी रहना। आज के भारत में, जहाँ सपने देखने वाले करोड़ों हैं और मौके चंद , यही शायद सबसे ईमानदार कहानी है जो किसी ने कही है।
इसे सुकून के लिए मत देखिए। इसे किसी को पहचानने के लिए देखिए। इसे उसे आख़िरकार, ठीक से देखने के लिए देखिए।