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जब तूलिका बन गई तबला – टुनटुन बिहारी का चुनावी तमाशा!  

ज़रा सुनिए तो! जब राजनीति की रंगोली में रंग भरने वाले कलाकार, खुद रंगमंच पर आ जाएं, तो समझिए कि बात में कुछ ‘रंग’ तो है! आज तूलिका छोड़ के तबला पकड़ लिया है ! कैनवास को किनारे रख के, कैम्पेन को बीच में ला दिया है! जी हाँ दोस्तों, जब चुनाव का बुखार इतना तेज़ हो कि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार नरेंद्र पाल सिंह उर्फ़ ‘टुनटुन बिहारी’ जी ने सोचा – अब बस! अब तो ब्रश से नहीं, बोल से बोलना पड़ेगा! ‘लाऊ के लाल आइहैं… तोहरा भटकइहैं’ – ये गाना सुन के आप समझ जाइएगा कि जब कला और व्यंग्य की जुगलबंदी होती है, तो प्रचार-पंडालों में भी ‘पैलेट’ बदल जाता है! तो तैयार हो जाइए बिहार की उसी चुनावी ऊर्जा के लिए, जहाँ हर नारा एक नक्काशी है, और हर सुर में सियासत का सुरूर है! पेश है – टुनटुन बिहारी का धमाकेदार म्यूज़िकल व्यंग्य!”

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