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शोर ट्रंप का, जीत मारिया की – क्या, क्यों और कैसे?

डोनाल्ड ट्रंप को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में वे एक बार फिर दर्शक बनकर रह जाएंगे। जिस पुरस्कार को पाने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया, वह उनके हाथ से फिसलकर वेनेजुएला की एक ऐसी महिला के हाथों में चला गया, जो अपने देश में छिपकर रहने को मजबूर है। मारिया कोरिना मचाडो,एक नाम जो तानाशाही के खिलाफ जिद का पर्याय बन गया है। और ट्रंप? वे बधाई देने वालों की कतार में खड़े हो गए, उसी इनाम के लिए जिसे पाने का उन्हें सपना था।

यह कहानी सिर्फ एक पुरस्कार की नहीं है। यह उस राजनीति की कहानी है जहां शोर मचाने और असल में कुछ करने के बीच नोबेल समिति फर्क करना जानती है। यह उस द्वंद्व की कहानी है जहां एक तरफ ताकत का प्रदर्शन है, तो दूसरी तरफ सिद्धांतों पर अडिग रहने का साहस।

मारिया कोरिना मचाडो का नाम जब नोबेल समिति ने घोषित किया, तो यह महज एक घोषणा नहीं थी ,यह एक संदेश था। वेनेजुएला, जो कभी लैटिन अमेरिका का सबसे समृद्ध देश कहलाता था, आज गरीबी के चरम पर है। लगभग 80 लाख से ज्यादा लोग देश छोड़ चुके हैं। 1958 से लेकर 1998 तक यहां लोकतंत्र था, फिर हूगो चावेज ने सत्ता संभाली और देश को तानाशाही की ओर धकेल दिया। 1999 में चावेज राष्ट्रपति बने, उनके साथ ही संसद पर कंट्रोल, मीडिया सेंसरशिप और भ्रष्टाचार का दौर शुरू हो गया।

2002 में तेल की कीमतों में उछाल के दौर में मारिया ने चावेज के भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला। कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के इशारे पर काम कर रही हैं। 2005 में उन्होंने बुश से मिलीं और बताया कि उन्हें अमेरिका से एक लाख डॉलर की रकम मिली है। मारिया सरकार के निशाने पर आ गईं, उन्हें अपने दो बेटों और एक बेटी को अमेरिका भेजना पड़ा। 2013 में चावेज की मौत के बाद निकोलस मादुरो सत्ता में आए और वेनेजुएला की हालत और खराब हुई।

मादुरो के दौर में चुनावों में धांधली का आरोप लगा और मारिया ने उनका मुखरता से विरोध किया। मादुरो अपने कमजोर शासन और ड्रग कार्टेल चलाने के आरोपों के चलते कुख्यात हैं। उनकी छवि आम लोगों के बीच एक रॉकस्टार जैसी है – उनकी रैलियों में लोग नारे लगाते हैं। लेकिन असलियत में वेनेजुएला का झंडा लहराते हुए सड़कों पर उमड़ पड़ने वाले लोगों की आवाज मारिया की है।

2024 के चुनाव में भी मादुरो ने धांधली करके राष्ट्रपति की कुर्सी पर कब्जा कर लिया। यूरोपियन यूनियन और कई अन्य देशों ने एडमंडो गोंजालेज को राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता दी है। लेकिन असल ताकत मारिया की है ,वे वेनेजुएला में ही रहती हैं, गिरफ्तारी के डर से छिपी रहती हैं, लेकिन अपनी आवाज नहीं दबने देतीं। एक ट्रक से निकलकर भाषण देती हैं और भाषण देने के बाद मोटरसाइकिल से निकल जाती हैं।

नोबेल समिति के अध्यक्ष योर्गेन वाटने फ्रिडनेसने ने कहा कि नोबेल पीस प्राइज के इतिहास में हर तरह के कैम्पेन और मीडिया दबाव देखे हैं। हर साल हजारों लेटर मिलते हैं, जिनमें लोग बताते हैं कि उनके लिए शांति का क्या मतलब है। समिति उसी कमरे में काम करती है जहां पूर्व पीस प्राइज विजेताओं की तस्वीरें लगी हैं, जो उनकी हिम्मत और ईमानदारी की याद दिलाती हैं। फ्रिडनेसने ने साफ कहा कि मारिया ने लैटिन अमेरिका में साहस का सबसे असाधारण उदाहरण प्रस्तुत किया है। जब दुनिया के कई हिस्सों में तानाशाही बढ़ रही है और लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, ऐसे समय में मारिया जैसे लोगों की हिम्मत उम्मीद जगाती है।

मारिया से पहले बराक ओबामा समेत चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों को नोबेल पीस प्राइज मिल चुका है। ट्रंप को ओबामा का नोबेल प्राइज सबसे ज्यादा खटकता है। उन्होंने बार-बार कहा है कि ओबामा ‘डिजर्व नहीं करते थे’ और ‘ओबामा ने कुछ खास नहीं किया।’ ट्रंप पीस प्राइज जीतकर बराक ओबामा से बड़ा दिखना चाहते थे, उनके इस चाहत को भी झटका लगा है।

ट्रंप ने अपने कार्यकाल में अमेरिका को पीसमेकर लीडर की इमेज बनाना चाहते थे। विदेशी मामलों के जानकार JNU के प्रोफेसर रजन कुमार कहते हैं कि अमेरिका पर ईरान-इजराइल जंग की तरह इतिहास में कई युद्ध भड़काने के आरोप हैं। ट्रंप चाहते थे कि उनके राष्ट्रपति रहते अमेरिका की छवि शांति के लिए मध्यस्थता करने वाले देश की बने। नोबेल पीस प्राइज इस छवि पर एक मोहर की तरह काम कर सकता था।

ट्रंप ने मई 2018 में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता रद्द कर दिया था, इसके बाद ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर तनाव बढ़ता गया। अमेरिका की मदद से इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए। अप्रैल 2020 में ट्रंप ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन यानी WHO पर चीन का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए उसे फंडिंग बंद कर दी थी। दूसरे कार्यकाल में भी ये रोक जारी है। नोबेल पीस प्राइज जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को लेकर भी दिए जाते हैं, जबकि ट्रंप ने अपने दोनों कार्यकाल में अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से बाहर किया है।

दुनिया के 150 से ज्यादा देश यरूशलम को फिलिस्तीन की राजधानी मानते हैं। दिसंबर 2017 में ट्रंप ने इसे इजराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दे दी। वहां अमेरिकी दूतावास भी खोला। इसके बाद पांच अन्य देशों ने भी मान्यता दी। इसे ट्रंप का इजराइल-फिलिस्तीन में तनाव और मध्य पूर्व में ध्रुवीकरण बढ़ाने वाला कदम माना जाता है।

अमेरिका के कई सहयोगी देशों पर ट्रंप के आक्रामक टैरिफ वॉर को भी दुनिया भर में तनाव और आर्थिक संकट पैदा करने वाला कदम माना जाता है। इसके अलावा ट्रंप के नॉमिनेशन को लेकर भी सवाल हैं, कहा जा रहा है कि उनके समर्थन में जो भी नॉमिनेशन आए, वो नोबेल कमेटी की डेडलाइन खत्म होने के बाद आए।

इतने आक्रामक कैम्पेन और मजबूत दावेदारी के बावजूद ट्रंप को नोबेल पीस प्राइज न मिलने की दो बड़ी वजहें हो सकती हैं – पहली, ट्रंप के सात जंग रुकवाने के दावे पूरी तरह सही नहीं। भारत-पाकिस्तान में जंग रुकवाने को लेकर पाकिस्तान ने ट्रंप का धन्यवाद किया था, जबकि भारत ने कई बार ट्रंप के दावे को नकारा है। भारत ने साफ किया कि सीजफायर के लिए पाकिस्तान के आग्रह के बाद इस पर फैसला लिया था। अफ्रीकी देश रवांडा और कांगो के बीच समझौते के बाद भी सीजफायर का उल्लंघन हुआ है। मिस्र और इथियोपिया के बीच का विवाद सुलझाने के लिए ट्रंप की कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है। दूसरी बड़ी वजह – ट्रंप की आक्रामक नीतियां शांति की कोशिशों के खिलाफ हैं।

नोबेल पीस प्राइज की घोषणा से दो दिन पहले 8 अक्टूबर को भी ट्रंप ने इजराइल और गाजा के बीच शांति समझौता कराने का दावा किया था। उन्होंने कहा कि पिछले 8 महीने में सात युद्ध सुलझा लिए हैं और आठवीं सुलझाने के करीब हैं। इसके अलावा आठ देशों ने ट्रंप को नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया था। इनमें पाकिस्तान, इजराइल, आर्मीनिया, अजरबैजान, माल्टा, कंबोडिया जैसे देश शामिल थे। ये ज्यादातर वे देश थे जिनके पड़ोसी देशों से विवाद चल रहे थे और ट्रंप ने उनमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। इनके अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी सार्वजनिक रूप से ट्रंप के नाम का समर्थन किया था।

लेकिन अंत में, जब मारिया कोरिना मचाडो का नाम घोषित हुआ, तो ट्रंप ने X पर लिखा – “राष्ट्रपति ट्रंप शांति समझौते करना, युद्ध रोकना और जान बचाना जारी रखेंगे। उनके दिल में इंसानियत है, और उनके जैसा कोई नहीं होगा, जो अपनी इच्छाशक्ति से पहाड़ों को हिला दे।” यह बयान दिलचस्प है – मारिया को बधाई देने के बजाय ट्रंप ने खुद को ही केंद्र में रख दिया।

अगस्त 2024 में इस्पायर अमेरिका फाउंडेशन ने चार यूनिवर्सिटीज के प्रमुखों के साथ मिलकर मारिया को पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया था। उन्होंने कहा था कि मारिया ने वेनेजुएला और दुनिया में शांति के लिए लगातार संघर्ष किया है। अगस्त 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच शांति समझौता करवाया था। उसी महीने अमेरिका के फ्लोरिडा के चार सांसदों ने भी मारिया मचाडो के समर्थन में लेटर भेजा था। सांसदों ने बताया कि मारिया ने मादुरो सरकार में मानवाधिकार हनन को उजागर किया, जो नोबेल पीस प्राइज के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है।

मारिया ने अपने बयान में ट्रंप और अमेरिकी सांसदों को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि इस इनाम से वेनेजुएला की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच मिला है। लेकिन यह सहयोग दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और वास्तविक सिद्धांतों के बीच की रेखा धुंधली होती है।

आखिर में, मारिया कोरिना मचाडो की नोबेल शांति पुरस्कार की जीत एक संदेश है – साहस और सिद्धांत की जीत होती है, न कि सिर्फ ताकत और दबाव की। ट्रंप का शोर और उनकी हार यह बताती है कि नोबेल समिति राजनीतिक दबाव से मुक्त है। अंत में, यह कहानी तीन सबक देती है – पहला, लोकतंत्र के लिए लड़ाई कभी आसान नहीं होती, लेकिन यह जरूरी है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय सम्मान सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, न कि ताकत पर। और तीसरा, राजनेता अपनी छवि बनाने के लिए किसी भी जीत का श्रेय लेने की कोशिश करेंगे ,चाहे वह जीत उनकी हो या न हो। मारिया की जीत वेनेजुएला की जनता की जीत है, और यह दुनिया को याद दिलाती है कि शांति और लोकतंत्र की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती।

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