तारिक़ रहमान की टली दिल्ली यात्रा उस अविश्वास की कहानी कहती है, जो बांग्लादेश ने खुद अपने लिए गढ़ा है

कभी-कभी कोई रिश्ता टूटता नहीं, बल्कि खुद अपनी ही परछाई से डरकर पीछे हट जाता है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान की 23 अगस्त से प्रस्तावित तीन दिवसीय दिल्ली यात्रा का स्थगन कुछ ऐसा ही संकेत देता है। यह केवल एक कार्यक्रम का टलना नहीं, बल्कि ढाका की उस असुरक्षा का आईना है, जो बिना वजह भारत में खतरा तलाशती रहती है।
दिल्ली आने से पहले रहमान बीजिंग गए, जहाँ उन्होंने तीस्ता जल-बंटवारे की ज़िम्मेदारी चीन को सौंपने और युन्नान से म्यांमार होते हुए बांग्लादेश तक राजमार्ग बनाने का प्रस्ताव रखा , मानो रेत पर महल बनाने की कोशिश हो, क्योंकि म्यांमार का वह हिस्सा नेपीता की नहीं, बल्कि अराकान और चिन सेनाओं की मुट्ठी में है।
इसके समानांतर ढाका में कुछ नेताओं ने सऊदी अरब-पाकिस्तान-तुर्की के रक्षा समझौते से जुड़ने की बात छेड़ी, जिसे मीडिया ने ‘इस्लामिक नाटो’ कहा। पर यह विचार उतना ही खोखला है जितना रेगिस्तान में मृगतृष्णा – बांग्लादेश तीन ओर से भारत और चौथी ओर बंगाल की खाड़ी से घिरा है; उसका डीज़ल और प्याज़ तक भारत से आता है। तुर्की खुद आर्मेनिया के साथ पुराने तनाव में उलझा है, जो अब भारत की ब्रह्मोस मिसाइल हासिल करने की बातचीत में है।

इस बीच ढाका में जमात-ए-इस्लामी सत्ता की ओर बढ़ रही है, और हरकत-उल-जिहाद, जैश और लश्कर जैसे संगठन कॉक्स बाज़ार व चटगांव में सक्रिय हैं। घर की आग को पड़ोसी पर मढ़ना कोई रणनीति नहीं, पलायन है।
और जब दरवाज़ा खुद खुला मिले, तब भी उसमें कदम न रखना सबसे बड़ी चूक होती है। भारत के न्योते के बावजूद रहमान आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं, जबकि चीन और रूस के नेता वहाँ पहुँचने की पुष्टि कर चुके हैं। यह वह मंच था जहाँ आतंकवाद-रोधी सहयोग, व्यापार, बिजली आपूर्ति और आवागमन जैसे मुद्दों पर बांग्लादेश अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकता था , एक ऐसा अवसर जो हाथ में होते हुए भी फिसल रहा है, ठीक उस मछली की तरह जो जाल में आकर भी उछलकर वापस पानी में कूद जाए।
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका और चीन दोनों की छाया ढाका पर मंडराती रही है। हसीना के जाने के बाद यूनुस-नीत अंतरिम सरकार पश्चिम की ओर झुकी, तो अब चीन का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा है। भारत दोनों महाशक्तियों को स्पष्ट कह चुका है कि ऐसा हस्तक्षेप उलटा असर डालता है – नेपाल, श्रीलंका के हंबनटोटा और मालदीव के उदाहरण सामने हैं। इसके उलट भारत ने बिना किसी शर्त के श्रीलंका की अर्थव्यवस्था संभाली, मालदीव को पीने का पानी भेजा और महामारी के दौरान बांग्लादेश तक वैक्सीन पहुँचाई।
भारत ने जवाब कूटनीति से नहीं, तैयारी से दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर ,वह मात्र 21 किलोमीटर चौड़ी “मुर्गे की गर्दन” जो पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ती है ,के लिए त्रिकोणीय सुरक्षा ग्रिड की घोषणा की है। किशनगंज, चोपड़ा और धुबरी में नई सैन्य चौकियाँ, भूमिगत रेल-सड़क नेटवर्क और तोपखाना इस पतली गर्दन को ज़रूरत पड़ने पर “हाथी की गर्दन” में बदलने को तैयार हैं।
सबसे बड़ा फ़र्क़ यहीं छिपा है: बांग्लादेश के युद्धाभ्यास भारत को शत्रु मानकर रचे जाते हैं, जबकि भारत के युद्धाभ्यासों में बांग्लादेश का ज़िक्र तक नहीं , वहाँ केवल चीन और पाकिस्तान हैं। यही असमानता सब कुछ कह देती है। 1971 से चला आ रहा प्रस्ताव आज भी मेज़ पर है – प्रभुत्व नहीं, साझेदारी।