
पिछला पूरा हफ़्ता जैसे किसी सर्कस के झूले पर बीता। एक तरफ़ अलग-अलग तरह के काम के असाइनमेंट, दूसरी तरफ़ सेहत की खींचतान, और बीच में सफ़र की थकान। तीनों के बीच संतुलन साधते-साधते जब वीकेंड आया, तो सोचा कि अब ज़रा ठहरकर नई फ़िल्मों और ओटीटी रिलीज़ की ख़बर ली जाए। इसी तलाश में मेरी नज़र 2 अक्टूबर को रिलीज़ हुई ‘पूजा मेरी जान’ पर ठहर गई।
मंच पर ‘रोमियो-जूलियट’ का अंत होता है, तालियाँ बजती हैं, और परदा गिरते ही असली नाटक शुरू हो जाता है। ‘रोमियो’ बना अनिकेत भरे सभागार में ‘जूलियट’ बनी पूजा से प्रेम का इज़हार कर देता है। पूजा ‘ना’ कहती है। कुछ ही घंटों बाद अनिकेत इस दुनिया में नहीं रहता, और पीछे छोड़ जाता है एक ईमेल, जिसमें उँगली पूजा की ओर उठी है। चार साल डिब्बे में बंद रहने के बाद ZEE5 पर आई ‘पूजा मेरी जान’ इसी एक ‘ना’ की क़ीमत का हिसाब माँगती है।
फ़िल्म जो सवाल उठाती है, वे आज के भारत के सबसे ज़रूरी सवाल हैं। क्या एक औरत को अपना मन बदलने का हक़ है? क्या किसी की दोस्ती या मदद स्वीकार कर लेना प्रेम की रज़ामंदी मान लिया जाए? और क्या किसी पुरुष के टूटे दिल का बोझ उस स्त्री के कंधों पर डाला जा सकता है, जिसने बस ‘ना’ कहा? अदालत से लेकर सोशल मीडिया तक, ‘कैसी लड़की है पूजा’ का हैशटैग उसके चरित्र की चीर-फाड़ करता है। पूजा पर कसी गई एक फब्ती तो जैसे पूरे समाज का आईना है: “लड़की न हुई, पब्लिक वाई-फ़ाई हो गई, जिसका पासवर्ड हर किसी के पास है।” यह पंक्ति हँसाती नहीं, चुभती है। और फ़िल्म का सबसे यादगार वाक्य, “द प्रोसेस इज़ द पनिशमेंट”, याद दिलाता है कि ऐसे मामलों में फ़ैसला चाहे जो आए, सज़ा तो मुक़दमे की प्रक्रिया ही बन जाती है।
अभिनय फ़िल्म की सबसे मज़बूत कड़ी है। मृणाल ठाकुर पूजा को केवल ‘पीड़िता’ नहीं बनातीं; उनके चेहरे पर डर, उलझन और ग़ुस्सा बारी-बारी से उतरते हैं। हुमा कुरैशी वकील सना के रूप में संयत और भरोसेमंद हैं। पर बाज़ी मार ले जाते हैं विजय राज। अभियोजक जतिन के रूप में उनका ठंडा, चुभता अंदाज़ डराता भी है और क़ायल भी करता है।
मुश्किल लेखन में है। फ़िल्म अपनी बात कहने की जल्दी में इतना बोलती है कि दिखाना भूल जाती है। कई संवाद सोशल मीडिया की पोस्ट जैसे लगते हैं, और अदालती बहसें भाषण बन जाती हैं। जेल का प्रसंग, पूजा का अपना प्रेम-संबंध और अनिकेत का मन, सब अधूरे छूट जाते हैं। सहायक किरदार आते-जाते रहते हैं, और अंत इतना सुथरा है कि जिस बेचैनी को फ़िल्म ने जगाया था, वही ठंडी पड़ जाती है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की समीक्षा का सार भी यही था कि अच्छी नीयत अपने-आप अच्छी फ़िल्म नहीं बना देती, और ‘द हिंदू’ ने विषय की गंभीरता के बावजूद फ़िल्म को बेजान और ज़रूरत से ज़्यादा संवाद-आधारित पाया।
फिर भी ‘पूजा मेरी जान’ को ख़ारिज कर देना ठीक नहीं होगा। ‘पिंक’ ने कहा था कि ‘ना’ का मतलब ‘ना’ है; यह फ़िल्म आगे जोड़ती है कि ‘ना’ कहने के बाद भी एक औरत को जीने का, बदलने का और चुनने का हक़ है। कसावट की कमी खटकती है, पर सवाल सही जगह रखे गए हैं। एक बार ज़रूर देखिए, फ़िल्म के लिए कम और उस बातचीत के लिए ज़्यादा, जो यह शुरू करती है।