“एक कचौड़ी, दो समोसा” सिर्फ़ रील का मसाला नहीं, कालकाजी के ज़ख्म से निकली चीख है। सवाल यह है कि क्या इंस्टाग्राम ने इस चीख को चटनी बना दिया

दिल्ली की गलियों में कचौड़ी और समोसा आम तौर पर दोस्ती, चाय की टपरी और कॉलेज की कैंटीन की ख़ुशबू लेकर आते हैं। लेकिन सितंबर 2026 के आख़िरी हफ़्ते में यही दो शब्द एक ऐसे आक्रोश के वाहक बन गए, जिसने राजधानी की सड़कों से लेकर मंत्रियों के एक्स हैंडल तक हलचल मचा दी। दिल्ली विश्वविद्यालय में कालकाजी गैंगरेप के बाद निकले केवल महिलाओं के मार्च में छात्राओं ने “एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा” का नारा बुलंद किया। सुनने में यह किसी स्टैंड-अप कॉमेडी की पंचलाइन लगता है, पर इसके भीतर वही धार है जो किसी चाकू को मखमल में लपेटने पर भी बची रहती है।
ज़ख्म, जिससे नारा पैदा हुआ
इस तुकबंदी की जड़ें एक भयावह शाम में हैं। 21 सितंबर की शाम एक 17 वर्षीय किशोरी अपने हमउम्र दोस्त के साथ दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के कालकाजी मंदिर गई थी, और पूजा के बाद दोनों पीछे स्थित आस्था कुंज पार्क में चले गए। वहां पुलिसवाले बनकर आए तीन लोगों ने दोनों को रोका, कानूनी शब्दावली से डराया कि उन्होंने कुछ गलत किया है और उन पर केस हो सकता है, फिर लड़के को रोककर लड़की को सुनसान जगह ले जाकर उसका यौन उत्पीड़न किया।
व्यवस्था की पहली प्रतिक्रिया ने आग में घी का काम किया। घटना के दो दिन बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण ने अपने पार्कों में सूर्यास्त के बाद प्रवेश सीमित कर दिया। यानी अपराधी के बजाय फिर से उस सार्वजनिक जगह पर ताला लगाया गया, जहां महिलाएं जाती हैं। छात्राओं के लिए यह वही पुराना फ़ॉर्मूला था: बीमारी का इलाज मरीज़ को कमरे में बंद करके।
इसके बाद विरोध की लहर उठी। 23 सितंबर को LSR के पास करीब 200 छात्राओं का पहला बड़ा मार्च निकला, जिसमें कई ने प्रशासनिक कार्रवाई के डर से चेहरे पर स्कार्फ़ या मास्क बांध रखे थे। ज़रा इस विडंबना पर ठहरिए: आज़ादी मांगने वाली लड़कियों को अपना चेहरा छिपाना पड़ा। 28 सितंबर तक यह आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि सैकड़ों छात्राओं ने मिरांडा हाउस से आर्ट्स फ़ैकल्टी तक करीब दो घंटे मार्च किया, और इसे हाल के वर्षों में DU की सबसे बड़ी महिला-नेतृत्व वाली लामबंदी में गिना गया, जिसका बैनर था “हम औरतें आज़ाद हैं”।
आख़िर क्यों मजबूर हुईं बेटियां?
इन नारों को सिर्फ़ “मर्दों से नफ़रत” कह देना आसान है, पर आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। NCRB ने 2024 में बलात्कार के 29,536 मामले दर्ज किए, यानी देश में रोज़ाना लगभग 80। राजधानी की हालत और भी चिंताजनक है: दिल्ली में प्रति लाख महिलाओं पर 130.7 अपराध दर्ज हुए, जबकि राष्ट्रीय दर 64.6 है। न्याय की तस्वीर और धुंधली है, क्योंकि 2024 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में 45,832 दोषसिद्धियों के मुकाबले 1,23,340 मामलों में आरोपी बरी हुए।
और यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी। सितंबर के पहले तीन हफ़्तों में ही दिल्ली-एनसीआर में बलात्कार और यौन उत्पीड़न के कम से कम 13 मामले सामने आए, जिनमें कई बच्चियों से जुड़े थे।
घटना के बाद असली “सज़ा” किसे मिली, यह एक छात्रा की ज़ुबानी समझिए। समस्तीपुर की 17 वर्षीय मिरांडा हाउस छात्रा ने बताया कि गैंगरेप के बाद उसके माता-पिता दिन में कई बार फ़ोन करते हैं और कॉलेज के अलावा कहीं भी जाने पर लोकेशन शेयर करने को कहते हैं। इसी पिंजरे के ख़िलाफ़ छात्राओं ने “बेटी की लोकेशन नहीं, बेटे का इंटेंट चेक करो” का नारा दिया, जो लड़कियों पर निगरानी और लड़कों के व्यवहार की अनदेखी पर सवाल उठाता है। इसी कड़ी में “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” आंदोलन का सबसे स्पष्ट संदेश बनकर उभरा, जिसकी मांग थी कि ज़िम्मेदारी अपराधी पर डाली जाए, न कि महिलाओं के कपड़ों या आवाजाही पर।
मांगें भी हवा-हवाई नहीं थीं। प्रदर्शनकारियों ने बेहतर रोशनी और निगरानी, सुरक्षित आवागमन मार्ग और मौजूदा कानूनों के सख़्त अमल की मांग की। स्ट्रीटलाइट, CCTV, पुलिस गश्त, ये क्रांति के नहीं, बुनियादी नागरिकता के सवाल हैं।
मर्दों का जवाब: इडली-डोसा से लेकर मंत्री के मंच तक
जैसे ही नारा वायरल हुआ, पुरुषों की ओर से भी तुकबंदी की बौछार शुरू हो गई। एक यूज़र ने लिखा “1 इडली, 2 डोसा, हर मर्द नहीं एक जैसा”, तो दूसरे ने “मक्के की रोटी, सरसों का साग, नारी शक्ति ज़िंदाबाद” से समर्थन जताया। यहां पुरुष प्रतिक्रिया दो खेमों में बंटी दिखी: एक “Not All Men” की रक्षात्मक ढाल उठाता है, दूसरा तालियां बजाकर साथ खड़ा होता है। कुछ ने तो खुद आलोचना की धार और तेज़ कर दी, जैसे “गरम-गरम वड़ा पाव, मर्द जात सुधर जाओ” वाला कमेंट।
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब सत्ता के गलियारों से आवाज़ आई। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इन नारों पर चिंता जताते हुए पूछा, “हालात ऐसे क्यों हो गए कि हमारी बेटियों को ऐसे नारे लगाने पड़ रहे हैं? इस पर गंभीरता से सोचना होगा।” एक मंत्री का यह सवाल इस बात का सबूत है कि कचौड़ी-समोसे की यह गूंज कैंपस की दीवारें लांघकर सत्ता के कानों तक पहुंच चुकी है।
रील बनाम रणभूमि: सोशल मीडिया ने क्या किया?
सोशल मीडिया ने इस नारे को वह पंख दिए जो किसी प्रेस विज्ञप्ति को कभी नहीं मिलते। इंस्टाग्राम पर एक रील में इस नारे को कविता कृष्णमूर्ति और नूरजहां से लेकर नेहा कक्कड़ तक, पांच गायिकाओं की आवाज़ में गाया गया। कमेंट सेक्शन एक तरह का “स्लोगन बैटल” बन गया, जहां किसी ने “दो प्याज, एक बिरयानी, हर मर्द की अलग कहानी” लिखा।
यह आग दिल्ली तक सीमित नहीं रही। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्राओं ने इसी तर्ज़ पर “एक कचौड़ी, दो समोसा… इस वीसी का क्या भरोसा” और “आलू लो, पूरी लो… इन मर्दों से दूरी लो” जैसे नारे गढ़ लिए। नारा अब एक “टेम्पलेट” बन चुका है, एक ऐसा सांचा जिसमें हर कोई अपना गुस्सा भर सकता है।
पर यहीं ख़तरा भी छिपा है। जब कोई चीख रिंगटोन बन जाए, तो लोग उसकी लय पर थिरकने लगते हैं, उसके दर्द पर नहीं। जिस नारे का जन्म एक नाबालिग के साथ हुई दरिंदगी से हुआ, वह कुछ ही दिनों में मीम-फ़ैक्ट्री का कच्चा माल बन गया। किसी वीडियो या नारे का वायरल होना अपने आप में प्रदर्शन के असर या व्यापक समर्थन का पैमाना नहीं है। लाइक्स और शेयर तालियां हैं, फ़ैसले नहीं।
मैं ठहर कर सोच रही हूं कि इस सबकी शुरुआत जिस 17 साल की लड़की के साथ हुई बदसलूकी से हुई, वह जब इन नारों को “वाइब” बनते देखती होगी, लोगों को उन पर हंसी-ठिठोली करते, ठुमके लगाते, रील बनाते देखती होगी, तो कितने आंसू रोती होगी? जिस शाम ने उसकी ज़िंदगी को दो हिस्सों में चीर दिया, वही शाम आज किसी के लिए कमेंट सेक्शन का मनोरंजन है। उसके दर्द से जन्मा नारा पूरे देश की ज़ुबान पर है, पर क्या किसी ने एक पल रुककर उसके लिए दुआ की? हम उसकी चीख को गुनगुना रहे हैं, पर उसके ज़ख्म को भूलते जा रहे हैं। यह संवेदना का वह दिवालियापन है, जिस पर कोई ट्रेंड नहीं चलता।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विरोध की भाषा में हास्य कोई नई चीज़ नहीं। अकादमिक अध्ययनों ने 2018 के अमेरिकी विमेंस मार्च के उत्तेजक पोस्टरों की पड़ताल करते हुए ऐसे आक्रामक हास्य को “कार्निवलेस्क” की समकालीन अभिव्यक्ति माना, जो सामाजिक बदलाव से जटिल रूप से जुड़ा है और जिसमें क्रांतिकारी और रूढ़िवादी, दोनों प्रवृत्तियां मौजूद रहती हैं। यानी हंसी एक दोधारी तलवार है: वह सत्ता का मज़ाक भी उड़ा सकती है और गंभीर मुद्दे को हल्का भी कर सकती है।
सरहद पार का अनुभव भी आईना दिखाता है। पाकिस्तान के औरत मार्च में जब नारे वायरल हुए, तो आयोजकों को बलात्कार और जान से मारने की धमकियों तक का सामना करना पड़ा। वहां की आयोजक लीना ग़नी ने कहा कि विरोध आंशिक रूप से इस डर से भड़का कि “फ़ेमिनिज़्म” का मतलब पुरुषों से नफ़रत है, जो बिल्कुल सच नहीं। DU के नारों पर भी यही आरोप लग रहा है, और यही भ्रम असली मुद्दे को धुंधला कर देता है।
क्या नारे अपना काम कर पाए?
ईमानदारी से कहें तो जवाब “हां भी, नहीं भी” है।
हां, क्योंकि जिस मुद्दे पर दिल्ली हर कुछ साल में सोती-जागती है, वह इस बार हर स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर पहुंच गया। एक केंद्रीय मंत्री को सार्वजनिक रूप से सवाल पूछना पड़ा। इसी दौरान 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कालकाजी समेत दिल्ली-एनसीआर के मामलों का स्वतः संज्ञान लिया और कहा कि ये घटनाएं क़ानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इसे सीधे नारों का नतीजा कहना अतिशयोक्ति होगी, पर माहौल बनाने में सड़क की आवाज़ की भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता।
नहीं, क्योंकि ट्रेंड की उम्र तितली जितनी होती है। अगले हफ़्ते कोई नया रील-ऑडियो आएगा और “कचौड़ी-समोसा” एल्गोरिदम की कब्र में दफ़न हो जाएगा। असली कसौटी यह है कि क्या पार्कों में रोशनी आएगी, क्या बस स्टॉप सुरक्षित होंगे, क्या थाने में शिकायत लिखी जाएगी, और क्या बरी होने वालों की वह फ़ौज छोटी होगी। बातचीत लोगों की सोच बदल सकती है, पर अपने दम पर न स्ट्रीटलाइट ठीक कर सकती है, न पुलिस स्टेशन को फिर से प्रशिक्षित कर सकती है।
और जब बात कैमरों की आती है, तो सवाल और नुकीले हो जाते हैं। अरविंद केजरीवाल जब आम आदमी पार्टी की ओर से दिल्ली की सत्ता के शीर्ष पर काबिज़ हुए थे, तो जगह-जगह CCTV कैमरे लगाने का वादा बड़े ज़ोर-शोर से हुआ था। गली-गली में “तीसरी आंख” की बात हुई थी। तो वे कैमरे कहां हैं? अगर लगे हैं, तो चलते क्यों नहीं? और अगर नहीं चलते, तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? यह सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं है। सत्ता बदल चुकी है, पर कैमरों की धूल वही है। दिल्ली की सुरक्षा का धागा कई हाथों में उलझा है: क़ानून-व्यवस्था केंद्र के अधीन दिल्ली पुलिस के पास है, कैमरों और स्ट्रीटलाइटों की देखरेख राज्य सरकार और नगर निकायों के पास, और पार्क DDA के पास। यही बंटवारा जवाबदेही का सबसे बड़ा दुश्मन है, क्योंकि जब हर कोई ज़िम्मेदार होता है, तो असल में कोई ज़िम्मेदार नहीं होता। एक बंद पड़ा कैमरा सिर्फ़ ख़राब मशीन नहीं, एक टूटा हुआ वादा है, जो किसी अंधेरे कोने में किसी लड़की की चीख का गवाह बनने से चूक जाता है।
आख़िर में वह बात, जो DU की लड़कियां बार-बार कह रही थीं, और जो किसी रील में नहीं समाती। वे सुरक्षा की भीख नहीं मांग रहीं। वे एक ऐसा शहर मांग रही हैं, जहां रात भी उनकी हो और राह भी। कचौड़ी-समोसा तो बस वह थाली है, जिसमें उन्होंने अपना कड़वा सच परोसा है। सवाल यह है कि हम उसे चखेंगे, या सिर्फ़ उसकी फ़ोटो खींचकर आगे बढ़ जाएंगे